Tuesday, 20 January 2015

कभी इस गुलीस्तामेभी बहारे थी, आज जहां सेहेरा  है.
पतंगे तो यहां भी उडा करती थी, आज बंदोंका पहरा है.
रंगीन शामो की जगह, रात का अंधेरा है.
इतर बहा करता था जहा, उडता लहुका फव्वारा है.
सैलानियोकी भीड उमडती थी यहा, आज चील का चील्लाना है.
ये क्या बना दिया मेरे काबुल को ए खुदा,
जहा कभी सिक्कोकी झनझनाहट थी, आज भुको का कोहराम है.
इतिहास रचा जिस शहरने, उसका आज करता हैरान है.

No comments:

Post a Comment