फिर वोही दिवाली :
हर दिवाली मुझे कुछ याद दिलाती है,
उसकी गहरी आंखे मेरे सामने आती हैं.
लगता हैं कुछ पुछ रही हैं वो,
किसी बात का जवाब मांग रही हैं वो.
जानता हुं मै उन आखोंका राज,
जिनमे कभी ढुण्ढता था मै अपना कल और आज,
कालेज के दिनोमे पहचान हुई थी हमारी,
दिन ब दिन कम हो रही थी हमारे बिचकि दुरी,
बहुत प्यार करती थी वो मुझसे, और शायद मै भी.
सबसे लडती थी वो मेरे लिये,
शायद मै लायकहि नही था जिसके लिये.
कितने सपने देखते थे हम मिलके,
वो साथ हो तो लगता था बहुत करीब हैं हम मंजीलके.
पर वक़्त भी अपनी चाल चल रहा था,
मै अभी तक जिंदगीमे सेटल नही हो पा रहा था.
वो फिर भी मुझपे भरोसा कर रही थी,
मेरे लिये मोहलत पे मोहलत मांगे जा रही थी.
पर मेरा नसीब भी सिकंदर नहीं था उस वक़्त,
और वो भी बेचारी इंतजार करती कब तक.
एक दिन आया जब हमे फैसला लेना हि पडा,
वक़्त के दावं पेंच के आगे झुकना हि पडा.
आंसू भरे नैनोसे हम एक दुसरे से अलग हो गये,
एक कश्ती के मुसाफिर थे हम, पर अब किनारेहि अलग हो गये.
पता नही वो कौनसे शहर चली गई,
उस दीनसे मेरी भी तो दुनियाहि बदल गई,
उसकी वो पानी पानी आंखे आज तक मेरा पिछा करती हैं,
मेरा क्या कुसूर था ये पुछती रहती हैं,
शायद मै उसे समझा पाता मेरी मजबुरी,
बीना उसके मेरी भी जिंदगी थी अधुरी.
आज जीवन मे मैने बहुत सफ़लताए हासील कि हैं,
पर उस दिन जो खो चुका वो कभी ना पाया मैने.
वो दिन भी दिवाली का हि था,
कुछ पटाखे जला रहे थे आसामा को,
तो कुछ आग लगा रहे थे मेरी आत्मा को.
तो कुछ आग लगा रहे थे मेरी आत्मा को.